ग़ज़ल

कल तलक झुकी नज़र का उठना ज़रूरी हो गया।
ख़ामोश ज़ुबान का बोलना मज़बूरी हो गया।।
बीता ली ज़िन्दगी यूँ गुमनाम कई रातें।
सुनहरे सहर का ख़्वाब हो मुकम्मल ज़रूरी हो गया।।
कल कल में बीते कई कल यहां।
अब आज का संवरना ज़रूरी हो गया।।
नहीं मानेंगे लोग मेरे सच को झूठ मानकर।
अब सच को सच झूठ को झूठ बताना जरूरी हो गया।।
देख, करना वादे ज़रा संभाल के यहां 'सहर्ष'।
पलटते ही यहां वादे से मुकरना ज़रूरी हो गया।।

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