चुप बैठे रहे (कविता)

चुप बैठे रहे खामोश तो क्या होता।
तुम्हे पता मुझे ख़बर कुछ नही होता।।
सुनो अब एक बात मेरी भी।
फिर सुनुंगा मैं तेरी भी।।
ये वक़्त जो सामने तेरे निकल रहा।
तू बेकार विकल रहा।।
है तेरी वजूद तेरी पहचान।
तू दौर उसे जा पहचान।।
तेरा खून, तेरे अपने रिश्तेदार।
कभी नहीं करेंगे तुझे खबरदार।।
अब छोड़ ये आँसू और समंदर-ए-ग़म।
मुस्कुरा के अब आंखें नहीं होगी नम।।
है बात जो समझा 'सहर्ष', तू औरों को भी बता।
क्या पता एक भटके मिल जाए उसका पता।।

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