सुबह की सैर


 

ऐसा लगा आज, 

चूहे की दौर से उकता गया

या यूं कहें

की वक्त मिल गया 

सोचने का, समझने का

छोड़ दिया कार का आराम,

बाइक की गति

दोनों।

निकल पड़ा पैदल 

दूर, जहां दोनों तरफ

नरम घास 

उसपर सारी रात 

चुपके से आ बैठा

ओस का बूंद,

कई जा मिले ज़मीन में,

कई अब भी 

काबिज़ थे उस घास पर

किसी योद्धा की तरह,

पास बहती नदी

की कल कल सुनने के लिए,

पैदल, सिर्फ पैदल,

जरूरी है।

मशीन सा भागते रहना

फिर रुकना और भागते रहना

फिर मानव के पास

शेष क्या?

कुछ भी नहीं।

मद्धिम मद्धिम

आसमान चढ़ते सूरज का निखार

पास बहती नदी की चमक

उसमें इतराते मछली और

परिंदों की धमक,

सब शांत, सुमधुर

एक बड़ी सी शांति।

यहीं ठहरने को जी चाहता है

लेकिन फिर क्या जब ये कल कल,

परिंदे की चहक सब

दिन के कोलाहल में

खो जाएंगे।

नदी शिथिल पड़ने लगेगी

सूरज जलाने लगेगा

घास बदरंग होने लगेगा?


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