ग़ज़ल


 

अब दरो-दीवार से आवाज आती है

जैसे बजती कोई साज आती है

कभी सुनते थे हम धड़कनें उसकी

गुजरती चुपके से बात-ए-राज़ जाती है

कहने को तो कभी होंठ हिलते हैं

मगर जुबां चुप रह जाती है।

हालत ठीक वैसी यहां मेरी जैसे

बिना समझे बात रह जाती है।



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