I see I think I mix I prepare and I make them appear in purified form that I call -POEM
अब दरो-दीवार से आवाज आती है
जैसे बजती कोई साज आती है
कभी सुनते थे हम धड़कनें उसकी
गुजरती चुपके से बात-ए-राज़ जाती है
कहने को तो कभी होंठ हिलते हैं
मगर जुबां चुप रह जाती है।
हालत ठीक वैसी यहां मेरी जैसे
बिना समझे बात रह जाती है।
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