इससे ऊंचा उससे ऊंचा (कविता)

एक शाम ताड़ के पेड़ पर,
जा बैठे थे दो बगुले,
की बातें दुनिया की,
जिसे देखा था जाकर उसने-
"देखो सबसे छोटा घास,
उससे बड़ा दूसरा घास,
उससे बड़ा दूसरा घास।
उससे बड़ी झाड़ी,
झाड़ी से बड़े,
छोटे पौधे।
उनसे बड़े पौधे।
पौधे से बड़े और कोई पेड़,
उन पेड़ों में सबसे बड़ा यह पेड़।
तुम ही बताओ, इसकी क्या पहचान?
यह तो बस देखता है, जैसे आसमान।
इस गर्मी में देखो, कितने जीवों को मिलता है,
आराम उन पेड़ों के नीचे।
उन छोटे पौधों के नीचे,
और झाड़ियों के नीचे।
ये खड़ा है,
सीना ताना हुआ सबसे ऊपर।
आखिर, किस काम का ?
इसकी बनती है छाया भी बड़ी छोटी,
जहां बैठो तो धूप जलाती है।
आखिर, इसकी छाया किस काम की ?
और यह पेड़ किस काम का ?"
अब तक चुप बैठा था जो बगुला,
बोल पड़ा-
"भाई, बात तुम्हारी सब सच है,
कुछ भी गलत नहीं कहा तुमने,
पर जो और सच था,
उसको कहा नहीं तुमने।
जहां तुम बैठे हो,
वहीं से दिखती है तुमको सारी दुनिया।
और उसी जगह कि तुम कर रहे हो,
लाख बुराई।
अब बताओ, तुम भाई।
तुम में है कितनी अच्छाई।"
सुन रहे बगुला ने फिरअपना जवाब दिया-
"अच्छा तो तुम ठीक कहते हो,
पर हमने जो कहा वह भी तो सच है।"
झट से दूसरे बोले ने कहा-
"तुमने जो कहा वह सच नहीं,
पर वह आधा सच है।
इससे ऊंचा उससे ऊंचा,
है कुछ नहीं दुनिया में।
सब की है अपनी अहमियत,
अपना काम, अपना नाम,
जिसकी जितनी ताकत,
वह उतना आता लोगों के काम।




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