नन्ही सी प्यारी सी (कविता)
पिछले कई दिनों से,
मैं जानता हूं,
एक छोटी सी,
नन्ही सी गोरैया को।
जो चुपचाप आती है,
तब, जब मैं वहां नहीं होता हूं।
वह आती है,
मेरे खिड़की पर बैठती है।
और,
फिर देखती है, चारों तरफ।
जब कोई शोरगुल,
जब कोई डर,
जब कोई अंदेशा,
नहीं नजर आता,
तो वह धीरे से,
मेरे डाले हुए सूजी के दानों पर,
उस खिड़की की जाली के पार आती है।
और,
फिर चुपके से साथ में,
दूसरे गोरैया के,
वह चुगने लगती है।
जब देखा कभी तो कोतुहल बस,
सोचा,
उसकी एक तस्वीर रख लूं,
अपने पास।
पर ज्यों ही गया पास खिड़की के,
उसे किसी भय ने वहां से उड़ा दिया।
फिर मैं इंतजार करता रहा,
पर वह नहीं आई।
फिर मैं अपने काम में खो गया।
और, फिर,
एहसास हुआ उसकी आवाज से,
की वह आकर दाना चुग रही है।
शायद अब उसे डर नहीं था,
कि मैं वहां जाऊंगा।
या उसे पकड़ लूंगा,
या फिर उसे,
कोई और डर सताएगा।
वह दाना चुगने में व्यस्त थी,
और मैं उसे देखने में।



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