आज फिर से सड़क... (कविता)

आज फिर से सड़क दुल्हन हो गयी थी।
वो कल का अतीत था,
लोग आते थे, दाँत निपोरे खड्डों
से बच निकलते थे,
कुछ नादान उसकी बदसूरती 
की चपेट में आ जाते,
तो कई हमेशा के लिए चले जाते।
बात क्या थी, कुछ नहीं
न लोगों को फ़र्क पड़ता,
न वहां की सरकार को।
'क्या होगा, जब तलक चलता है,
चलने दो, आएगा कोई बड़ा
तो फिर देख लेंगे' की सोच
से कब तलक, न जाने,
 सबको अपने मंज़िल तक 
पहुचाने वाली यूँ ही पड़ी रही।
ख़ामोश, दर्द से कराहती, आँसू बहाती।
ये सब खो जाते थे उसपर होने वाली 
हलचल में।
कभी कोई परिंदा तो,
कोई भटका जानवर,
जो यकसां रुक जाता,
लगता शायद उसका हमदर्द
बना रुका।
पर सब व्यर्थ,
क्या फायदा, हाँ सुकून का पल होता,
 अपने ज़ख्मों को देखने का, 
आधी रात को,
वो ख़ामोशी भी अक्सर,
 कभी-कभी टूट जाती।
आज साहब आने वाले थे,
पौ फटने से लेकर सूरज आने तक
सड़क जवान हो गयी थी,
जैसे नई दुल्हन, 
पर उसके अंतर मन में,
वही अतीत था, जिसमें,
उसे फिर मिलना था।
बात कुछ भी हो,
आज फिर से, सड़क दुल्हन बन गयी थी।



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