ये जो चाँद ग़ज़ल
ये जो चाँद आसमाँ से ज़मीं पर मुस्कुराता है।।
के देखो आदम अपने हुस्न पर कितना इतराता है।।
कोई अपने में खोया, तो कोई बहुत दूर
चलते फिरते यहां वहॉं बस बरबराता है।
क्या दे दी फिर से उसे किसी ने नसीहत
जो ये नज़र-ए-बुज़ुर्ग से इतना कतराता है।
हो ज़िंदादिल और आंखें हैं खुली तो लो सबक'सहर्ष'
घायल परिंदा मरने से पहले कितना फड़फड़ाता है।





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