एहसास (कविता)

जी आज ज़रा
आपसे गुफ्तगू का मन बना
सो लगा बोलने।
हाँ ये भी कि
मैं ही वक्ता, मैं ही श्रोता
पर फिर भी दोनों साथ होंगे।
हाँ तो मैं कह रहा था।

एहसास, आपका
मेरा
सब एक जैसा है
ये बात गैर कि
अपनी गरिमा अपने ख़्याल
सब मुझे बदलने की कोशिश
करते हैं
मगर मैं बस मैं हूँ।

गर आप अमीर
हैं,
किसी कामगार से,
आपकी अलग हो सकती है।
दूर आसमाँ में चमकता चाँद
का भी एक एहसास है,
हमसे, आपसे कई गुना बेहतर।
जो वो मुस्कुराता है कि
उसकी चांदनी में-
एक मछुआरा कितनी शिद्दत
से कोशिश कर रहा है।
एक कामगार जो छोटे से बाज़ार में
बिजली के जाने से चांदनी में
टायर की मरम्मत कर रहा है।
कुम्हार, जिसके ढ़िबरी की तेल खत्म हो गयी
वो चांदनी में कई सुंदर आकार
दे रहा है निर्बाध।
गाँव जहां आज भी बिजली
एक हसीं ख़्वाब भर है,
बच्चे सड़कों पर टायर का पहिया
बना झुंड में भाग रहे हैं।
पहरेदार किसान बगीचे में
एक टक अपने आमों को
देख रहा है, जो कल पक जाएंगे
और उसके घर नए कपड़े आएंगे
उसे बेचकर।
ऐसे कई एहसास हैं,
मगर मैं हर जगह वही।
हाँ, ये अल्फ़ाज़, तहज़ीब, देश, देशांतर
मुझे अक्सर कई नामों से जानते हैं
मगर मैं बस एहसास हूँ।

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