घास काटती लड़की



 वो घास के बीच थी 

उसके चारो तरफ घास थे 

वो खेत में थी 

खेत शायद उसका न था 


तभी क़दमों के दूरी पर 

सूने पटरी पर

मेरी ट्रेन आ रुकी 

रुकना क्या था 

दो घंटे की देरी थी

जहाँ चाहे वहां रूकती थी

खैर 

वो लड़की 

जो अब अपने हाथों में 

घास का कुछ गुच्छा लिए थी

निगाहों से वो 

ट्रेन के पास आ पहुंची थी 

वय शायद 13 या 14 की थी

फिर मन का चलना स्वभाव था 

बाहर ट्रेन में काला शीशा 

शायद उसके लिए पहेली थी

मगर

सिर्फ आज 

या हमेशा के लिए 

किस्मत गर बदली 

या उसने किस्मत को बदल दिया 

फिर ये अबूझ शीशा क्या

कल हवा में भी उड़ेगी 

यह सोच ही रहा था 

कि ट्रेन फिर चल पड़ी।

फिर से कभी रुकने के लिए

फिर से चल चलने के लिए।

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