पूँछ कटी छिपकली
किसी काम में मसरूफ था
तभी नज़र नीचे पड़ी
देखा एक पूँछ कटी छिपकली
भागते खुद को घसिठते
कटा भाग रक्त से सज्जित
दे रहा था असीम कष्ट उसे
उसके भागने में उसके चलने में
मुझे दिखी एक मानव की ज़िंदगी
ठीक वैसे ही घिसटती भागती
दर्द में छटपटाती और कराहती
ख़ैर पूँछ के फिर से आने का भान था
ऐसे ही मानव जीवन में
कष्ट के बाद हर्ष आ आविर्भाव।



Comments
Post a Comment