बस का सफ़र
समय आगे आगे
मैं चला पीछे पीछे
जल्दी में था क्या करता
सिवा कि आहें भरता
दौड़ाया बाइक को
साथ अपने दोस्त को
पहुँचा जैसे तैसे
फिर न कभी जैसे
गाड़ी से पहुँचा पहले
मन को बोला देखले
निज़ामसागर से एम जी बी एस
फिर तो बस यात्रा का था बस
लेकिन ऐसा कहाँ था नसीब
बस में न था कोई हबीब
घुसा हुआ जैसे तैसे
भीड़ की ऐसे तैसे
सब सीट थी भड़ी पड़ी
बीच रास्ता भी नकचढ़ी
कन्डक्टर की धौंस भी
थे तो सब खामोश भी
चलो बढो आगे और आगे
जगह नहीं थी और आगे
एक को दिया धक्का
दूजे ने लिया धक्का
फिर धक्का पर धक्का
फिर धक्का ही धक्का
मेरे शर्ट की इज़्ज़त
चलो सर बढ़ो आगे
तोड़ो मोह के धागे
उस संकड़े मार्ग पर
मुश्किल की राह पर
पहले तो लड़की फिर महिला
था बन गया रास्ता एक किला
कभी इसकी धक्का मुक्की
कभी उसकी धक्का मुक्की
इसकी खुसफुस उसकी खुसफुस
सिर्फ मैं चुप बाक़ी सबकी खुसफुस
बाहर हल्की ठंडी शाम
अंदर गर्मी का कुहराम
फिर क्या मेरी शर्ट
और क्या मेरी इज़्ज़त
मैं अकेला तन्हा
बाक़ी देखी सबकी सोहबत
जीवन के एक जंग में
था एक और जंग शामिल
क्या था मेरा खोना
क्या था मेरा हासिल
तीन के सीट पर बैठा था कोई चार
मैं चुपचाप रहा करता विचार
भीड़ में मैं दबा था कोई बात नहीं
बच्ची दबी कैसे कोई बात नहीं
औरतों को फ्री टिकट
मेरे लिए नही था कोई विकट
कुछ थे जिन्हें दिक्कत थी
वो या उनकी किस्मत थी
सारा जिस्म पाँव पर
पाँव मेरे उस काले चप्पल पर
चप्पल मंथर गतिशील बस के फर्श पर
शरीर का वज़न पाँव पर
पाँव का वज़न चप्पल पर
सारा वज़न पैरों की उंगली पर
सारी उँगलियाँ उस काले चप्पल पर
जो चप्पल मेरा शान मेरी जान थी
वो लगती बस पल की मेहमान थी
मैं कसमस कसमसाहट में था
थोड़ी जल्दी हड़बड़ाहट में था
पहले तो मिनट फिर बीते कई घंटे
और तो फिर बीते घंटे पर घंटे
सोचा तो था जल्दी पहुंच जाऊँगा
कहाँ पता था ऐसे फँस जाऊँगा
अपनी कार मेरी अपनी मर्ज़ी थी
यहाँ ड्राइवर और कंडक्टर की मर्ज़ी थी
करता भी क्या फँसा भी था ऐसे
फिर नहीं था कभी जैसे
फिर सोचा चलो झेलेंगे
इसी रास्ते के हो लेंगे
फिर मेरी भी बारी आयी
मानो मेरी सवाड़ी आयी
एक उठा तो एक ने बैठने दिया
एक उदास को ज़रा हँसने दिया
कई यादों से ये यादें रहेगी साथ
भूलेंगे इसे भी फिर नया होगा साथ।



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