अबके क्या हो गया

 पहले की पेन टूटती नहीं थी

अबके पेन टिकती नहीं है

पहले की किताब सालों साल

अबके हर साल बदल जाती है

पहले की कार हिलती नहीं थी

अबके तो टुकड़ों में बंटती है

पहले के चापाकल 15-20 फीट पर

अबके तो 500-100 फीट पर पानी 

पहले तो खेतों में अनाज उगते थे

अब तो ज़हर उगाए जाते हैं 

पहले तो नदी जीवन होती थी

अबके तो नदी जीवन मांगती है

पहले तो रिश्ते भर भर के रहते थे

अबके तो रिश्ते खोखले होते हैं 

पहले के गावँ में शांति समृद्धि

अब शहर की राह खोजती है

पहले के वस्त्र ढंग के होते थे

अब बेढंगा फैशन ही वस्त्र आधार

पहले ज़मीन पर नींद आ जाती थी

अब ज़मीन सारा नींद ले लेती है

खाता पीता कितना समृद्ध सा था जीवन

अब जीवन अशांत समृद्धि के राह में

आख़िर क्यों?

आख़िर कौन जिम्मेदार?

मैं?

आप?

या हम सब!

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