हाय रे तोता



 हाय रे तोता 

तू कितने शान से उड़ता था यहां

हवा में कलाबाजियां करता था,

जब जी चाहे ऊपर 

जब चाहा नीचे करता था।

किसकी लगी तुझपे नज़र 

क्यों हुआ तुझपर असर?

अब कौन बताएगा

अब कौन समझाएगा?

तू उड़ता कितना सुंदर था

तू बोलता कितना सुंदर था

तुझे याद है!

मैंने तुझे,

कुछ बिस्किट के चूड़े डाले थे।

तेरे टी टी की आवाज़ से

मैं कितना हर्षित होता था,

यहीं इसी ब्रिज पर 

कितने मर्तबे

कितनी दफा!

तेरे गर्दन की लाल धारी को 

अक्सर किताब के फोटो से मिलाता, 

फिर सोचता खुश होता था।

अब तू स्थिर पड़ा जड़ है।

तेरे कठोर पड़े 

इन पंखों में कितने बाक़ी हौसले होंगे

इस शरीर में कितनी चाहत शेष होंगी

सब शेष रह गया 

शेष रहने के बाद।



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