सन्नाटे के बीच में

रात का आख़िरी पहर था

सब खामोश थे

ज़मीं पर सन्नाटा लोट रहा था

आसमान ऊपर सुस्ता रहा था

किसी का किसी से मेल नहीं

सब अपने अपने जगह

बस खामोश

लेकिन कब तक

वक्त की आंधी में

इसे भी बहना था

रात ने अपना आख़िरी रंग बदला

सुबह की आहट हुई

अचानक सब जग गए

चिड़ियों की चहचहाहट

धीरे धीरे बढ़ने लगी 

और फिर

सिर्फ चहचहाहट

एक बार फिर से

चहचहाहट के साथ आए कई आवाज़

में खामोशी कहीं खो गई

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