चांद की परछाई

 चांद एक था 

ख्याल दो थे

रात एक थी 

एहसास दो थे

रास्ता एक था 

मुसाफिर दो थे

हवा एक थी 

असर दो थे

कला एक थी

दीदार दो थे

उसे चांद में परछाई दिखी

मुझे कोई बड़ा नज़ारा मिला

रात को ठंड से वो 

क्या करता सिवा कांपने के

मैं बस उस अद्भुत छटा पर

मूक बना विस्मित था

मेरी खुशकिस्मती

ज़िंदगी मजे में

वो ज़िंदगी से लड़ता हारता

दिन भर की थकान और 

कैंपस की मसरूफियत

से निजात दी नई हवा ने

उस दीन की दुनिया को 

सिहरन के सिवा कुछ नहीं।

चमचमाती पीली रोशनी में

लहरों की अटखेलियां मेरे लिए

मुश्किल का सबब बना था 

उसके कांपते पांव के लिए।

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