ग़ज़ल

आओ क़रीब के सहर होने को है

बाक़ी ज़िंदगी पल में खोने को है

जिसे जगाकर रखा पूरी रात यूं

खुले आंखों में वो सोने को है

बरसों से पड़ी थी बंद जो ज़ुबान

किसी से कुछ तो कहने को है

कौन जाने क्यूं हुआ था मजबूर

वही ख़ामोश लब अब मुस्कुराने को है।

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