ग़ज़ल

घनी रात है नीचे दरख़्त के साए

उड़ते परिंदे यहीं कहीं आ जाए

फिर दिन की थकान, बोरियत

यहीं आस पास कहीं बंध जाए

कल की फिर खोज शुरू हो

बस नींद में रात गुजर जाए

टूटते हैं ख़्वाब के तारे 'सहर्ष'

कहीं सहर न उठा ले जाए।




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