गोबर भी नसीब नहीं


 

सीमा का गाँव 

आज ही शहर बना था।

वो सड़क 

जहां से गोबर उठाती थी

आज ही नई बनी थी।

वो टोकरी 

जिसे उसने आज ही नई खरीदी थी।

सब के सब

बदल गए थे 

सबकी पहचान नई थी।

सड़क जहां से भर भर कर

उठाती थी गोबर

वहां गोबर को

आती जाती गाड़ियों ने रौंद डाला था।

उसकी नई टोकरी

हाथ में थम सी गयी थी

ज्यादा गोबर उठा लेने की 

चाह से फिसलने से रुक सी गयी थी।

चमकती आंखें जो सड़क पर

सिर्फ गोबर ढूँढती थी,

थके राही के कदमों के आहट सी

सहसा थम सी गयी थी।

कदमें खड़ी थी

मगर बेजान सी सड़क के किनारे

आँखें धीमी धीमी साँसे लेती 

उस गोबर को रौंदते हुए

देखती रही।




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