उस पर
था वो मासूम या ढोंगी बना
था तैयारी में या चुपचाप पड़ा
उड़ने को था तैयार
या कुछ खोज रहा
कुछ पल तो मैंने देखा
ऊपर नीचे दायें बाएँ,
उसे परखा
था वो निरीह कमज़ोर
मेरी ताक़त के सामने
आया घिन उस पर
फिर बरसाया गुस्सा उस पर
बेसिन से गिरा नीचे
लगा उसमें तैरने
सोचा बहा दूँ
पाईप से कहीं नीचे
गिरा तो सही
मगर तैरा कुछ क़दम
फिर लगा बहने
आकुल हृदय मेरा
लगा उसे मैं बचाने
सहारे उंगली के उसे लाया ऊपर
मन भरा रहा पश्चाताप से
तभी मैंने उसे फूँक लगाया
उसने अपने भीगे सिकुड़े अंग को हिलाया
मन में आयी थोड़ी शांति
फिर उसे ऊपर उठाया
पहले की सांस
और बाहर की हवा ने उसे जगाया
ज़रा ठहरा और जा उड़ा
मन था पुलकित दिल हरसाया।


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