ग़ज़ल


चलो अब बुझाओ चराग़ है गर नापसंद तुम्हें

होगा तेरा भी घर अंधेरे में हो गर पसंद तुम्हें

उड़ाओ मज़ाक मेरा जितना तेरा दिल चाहे

फिर होगे बेनक़ाब तुम्हीं गर हो पसंद तुम्हें

खुदवा लो तुम क़ब्र चाहे जितनी भी गहरी

सोच लो गिरोगे तुम्हीं वहाँ गर हो पसंद तुम्हें

है शायरी मेरी बेमायने, तो कहो बन्द करूं

बचोगे महफ़िल में तन्हा, गर हो पसंद तुम्हें


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