ग़ज़ल

 

ये दरख़्त, ये शाख़, ये चलती हवा, बहुत हुआ

अब जाकर नीचे गिरा हूँ, थोड़ा आराम करूँगा

सुना है, मर्ग सबको गुमनाम करता है यहां

जाने लोग, जाने के बाद कुछ ऐसा काम करूंगा

वो दूर दरिया है, वहां डूबता अकेला महताब है

जाऊंगा वहां ऐसा कोई आगाज़-ए-सफ़ऱ करूँगा

वो तन्हा भी रहे और पूरी ज़िंदगी से बवास्तगी भी

उसके जैसा ही कोई कोशिश-ए-अंजाम करूँगा

यहां लड़खड़ाते दीये भी बुझाए जाते है न जाने क्यूँ

होगा जब आसमान मुट्ठी में जहाँ को रौशन करूँगा

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