द्वार से छोटा पहाड़


 

हर सुबह की तरह 

आज भी निकल गया घूमने

घर के अंत में 

शुरुआत सा दरवाज़ा

दरवाज़े के बाहर बरामदा

बरामदे से आलिंगन करता

बाहर सड़क को जोड़ता

छोटा सड़क

छोटा मिलता बड़े से

बड़ा अपने से बड़े से और

फिर बड़े सड़क के सहारे

कैंपस के बाहर सड़क को जोड़ती सड़क

पहले अंदर के इठलाती सड़क

से बाहर सड़क के अंत

में कैंपस की शुरुआत एक द्वार से

अंत भी उसी द्वार से

उसी द्वार के पीछे

एक बड़ा सा पहाड़

ढ़लान के कारण 

द्वार बड़ा और

सामने का पहाड़ लघु हुआ

पर अधूरा सच

पूरा सच, पहाड़ फिर से 

बड़ा हो गया

मैं ढलान से नीचे आ गया

पहाड़ वहीं था

द्वार वही था

मेरी आँखों का

भरमाता दृश्य अब शेष न था

सच, सच था

फिर से 

सदा के लिये।


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