आधी रात का चांद



 5 दिन से लंबे सफर में था 

सफर खत्म हुआ था 

फिर भी मैं सफ़र में था 

इस सफर के बाद फिर से अगला सफर था 

इसी सफर में 

नजर आया 

चांद का वह सफर

 जो हर सफर के बाद फिर से  

नया सफर चलता है 

 जो सफर कभी खत्म ही नहीं होता है 

रात आधी बीत चुकी थी 

बस स्टैंड से मेरे गंतव्य तक 

कहीं उजाला

 कहीं अंधेरा था 

मानो आंख मिचौली चल रही थी 

थोड़ा डर था मन में चारो बगल 

खामोशी थी।

ऊपर आसमान में चमकता 

पीला सा बड़ा सा 

चांद था।

 इस खामोशी में 

मेरे कुछ अतीत याद आए

 कुछ भय था और कुछ कंपकंपी 

और अपने गंतव्य पहुंचा 

लेकिन आधी रात का वह चांद

 मेरे सोने तक मेरे साथ रहा

 मेरे जागने के बाद मेरी स्मृति में रहा

 उसकी ख़ामोशी 

उसका ढलता यौवन 

सब एक जीवन की

 सच्चाई को बताता चला गया।

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