सड़क का पानी
कल मैं बौदवारा विज़ियानगरम आ.प्र. में
एक लॉज में रुका था
आज फिर किल्ताम्प्लेम स्कूल जाना था
अभी एक सुबह का
कुछ घंटा मेरा मेहमान था
सुबह की हवा खाने
पास में बादल से ढके बड़े पहाड़
को देखते सड़क पर निकल गया
टूटा फूटा बिल्कुल और किसी
प्रान्त की तरह ही अनसुना था।
टूटे में पानी जमा था
लेकिन आते जाते
किसी की नज़र वहां नहीं जमी
मैं एक पड़े धातु से
उस गड्ढे के पानी
को एक पतला धारा बना
निकालने लगा
लोग आए गए
बस, आये गए
सिवाय इसके कुछ नहीं
इस पानी को शायद अगले साल
फिर से उसी गड्ढे में जमना
था, और लोगों को इसकी आदत लगनी थी।
8.45 में मैं निकल गया उस होटल से
मगर सामने फिर कई गड्ढ़ों में वही पानी,
चुपचाप मुझसे मानो कुछ पूछ रहा था
और मैं ख़ामोश!
आगे बढ़ रहा था पैदल मानो
उसे करीब से निहारते हुए।



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