एक मेंढक

 



देखा सोया था सड़क पर

मगर दूर से

करीब से भी देखा

सोया था सड़क पर

फिर देखा,

पड़ा था सड़क पर

दोनों बांह दोनों हाथ फैलाए

सोचा आराम तलबी हो

देखा बेहोश था सड़क पर

फिर और करीब से देखा

मरा था सड़क पर

फिर सोचा

कोई था जल्दी में,

शायद इससे जल्दी में

वो जीत गया

ये हार गया

थे दोनों जल्दी में

इसकी रुक गई 

उसकी चलती रही

कहीं जाकर वो भी रुका होगा

फिर भी चला होगा 

मगर,

यह पूरी तरह से रुक गया था

भारी शरीर और धीमी गति

ने इसे मारा था

या वो तेज गति वायुपुत्र ने इसे मारा था

कौन मरा था,

किसने मारा था 

सब साफ था,

मगर दुनिया के इतने तेज हलचल में इसका न कोई बात था

सब चल रहे थे 

सब ढल रहे थे

कुछ घिसक रहे थे

कुछ फिसल रहे थे


मरा था बेचारा गुमनाम

बिना किसी काम

न था शायद कोई वारिश 

न कोई मालिक का नाम


होता गर कोई अपना नाम

छाता मीडिया में सुबहो-शाम

सड़कें होती गायब

ट्रैफिक में लगता जाम


होती नारेबाजी, आती आवाम 

खाना पीना होता होटल में

बाहर होता बड़ा नाम


संयोग, था वह अनजान 

न घर कोई न अपना मकान

थी उसकी भी एक दुनिया 

लोग थे फिर भी अनजान 


देखा मैंने इधर उधर

था नहीं कोई द्रुतगामी

कर ली तसल्ली फिर से मन की

उठाकर लकड़ी से

दिया उधर 


घास के बीच में

जहां नभगामी की नजरों से वह बचे 

शेष शांति का आलिंगन 

चुपचाप पास के सड़क-शोर के बीच कर सके।

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