रात को जल्दी है ग़ज़ल
रात को जल्दी है, सहर की तैयारी है
दोनों साथ दोनों अलग कैसी यारी है
गमों में डूबा पूरा वो मुस्कुराता है
कोई बताए ये कैसी बीमारी है
आना था तो आ जाते क्यों रुके
चलना मकसद, फिर नई तैयारी है
हसीं ज़िंदगी है मुस्कुराएंगे हर पल
कौन जाने कल किसकी तैयारी है
साथ थे साथ रहेंगे हम मानो 'सहर्ष'
ख़ामोश फिर वहां चलने की तैयारी है



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