ग़ज़ल


 ये अपने तजरबे में सबकुछ छुपा लेते हैं

उठे कोई लौ उसके ख़िलाफ़ बुझा देते हैं

तुम कहो कोई बात यूँ उसे क्या मजाल

वो हँसके सबसे अपनी बात मनवा लेते हैं

रहता है वो तो यूँ चुपचाप जब  देखो उसे

उसकी चुप्पी खुशियों की मीनार हिलाते हैं

कहने को वो खाने के नमक की अहमियत

थोड़ा भी रहकर वो खाना बुरा कर देते हैं

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