ग़ज़ल



अंधेरे-उजाले की बात को मुनासिब समझा जाएगा

जब धधकते आग को कोई मद्धिम हवा बुझा जाएगा

आओ देखेंगे जलते चरागों को यहां वहां दश्त में कहीं

जलता होगा कोई बुझता चराग़ जो रास्ता दिखा जाएगा

सुना है गाँव में है कोई बूढ़ा मुसाफ़िर चलो चलें  देखेंगे

मेरे पास भी एक मसला है मुमकिन कि हल मिल जाएगा

कहा था उसे ख़्वाब रखना ऊँचा भले जब भी'सहर्ष'

तारा नहीं तो क्या महताब तेरे हाथ में ज़रूर आएगा

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