चोरी से ग़रीबी की मार

 


शनिवार का बाजार

चारो तरफ लोगों का बाज़ार।

कुछ बूढ़े, कुछ जवान

चलते फिरते कुछ लाचार।

फल के ठेले के पास

अटका बूढ़े का आस

दुकानदार को देख व्यस्त

करने चला गरीबी को अस्त

झट से देखा इधर उधर

एक सेब गिरा दिया 

झटके से झोला के अंदर।

फिर चला, जैसे अजनबी

मगर पीछे से आई आवाज़ अजनबी

वो ताता इटरा (दादा इधर आओ)

मारे शर्म के चेहरा लाल

मत पूछो था क्या हाल

प्रकट में फिर भी बना वीर-

बोलो क्या बात है?

अरे चोर पहले रखो सेब यहां

फिर देखो सारा जहां।

अरे बोलो दाम अपने सेब का

है मुझे भरोसा अपने जेब का।

चुप रहो चोर कहीं के

दे मेरा ला रख सेब यहाँ

फिर जाओ चाहे जहाँ।

भीड़ भी देखी मज़मा वहाँ

फिर चले जिनको जाना था जहाँ।


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