नन्ही तितली
जा रहा था राह में
यूँ ही मस्त
खोया किसी काम में
चिंता थी किसी बात की
पाँव थे राह में।
तभी पाँव रुका
नज़र अटकी
एक छोटी सी जान पर
आ गयी थी उड़ते उड़ते
कहीं से आदम की राह में।
ठहरा ज़रा
झुका थोड़ा
और देखा उसे गौर से
उड़ते फुदकते
उस नन्हीं सी जान को।
मैं भी बच्चा बन गया
भूल गया कल अपना
खो गया अपने आज में
उड़नें लगा उस कल में
सपने की हसीन पंखों से।



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