प्यास
भूलकर वो आया था
अपने गाँव अपने देश को
ले उम्मीद की बुझाएगा
एक प्यास को
अचानक दुनिया थमी
ज़िन्दगी रुक सी गयी
हाहाकार और दुख में
वह भी निकला बाहर
मन में घर को ले चला आगे
मगर राह मुश्किल
कहीं रुक गया
कहीं झुक गया
वो जो रुकता न था
वो जो झुकता न था
तीन दिन बीते
सूना डगर
बिना आदमी के चुपचाप घर
सब सहमे सब डरे हुए
आस बिना आस का
राही वो चलता रहा
सरकार चुप
ख़ामोशी में कहती रही
ऐसी दास्तां
जिसकी ज़रूरत न थी
ऐसी इनायत
जिसकी आदत न थी
अब रास्ते पैर को
पैर रास्ते को जानते थे
खुद से कहते
खुदी को सुनते थे
पेट की आग से
तपता रास्ता
बाहर किसी को
नहीं था वास्ता
क्षण बीते
लगी प्यास भी
जीभ सूखा
तालु चटका
फिर हिला जीभ
और ऊपर रूक गया
होंठ हिले
और रगड़े
एक दूजे को
अब तक तना शरीर
अचानक झुक गया
शरीर में नस सारे
खुद में तन गए
गिरा धम्म से
एक तरफ किनारे
रास्ता सुनसान
न कोई आया
न कोई गया
तड़पा वह थोड़ा
फिर पटका पूरा बदन
होंठ फिर हिले
पेट अंदर जा छिपा
फिर प्यास मिट गई
लटकी सांसे टूट गयी।


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