मंगलसूत्र
मैं सड़क पर अपने तेज गति से
वो सड़क के नीचे जाती मंथर गति से
वो काम में उलझी
मैं भी अपने काम में मसरूफ
वो चलती रही
मैं चला भी रुका भी
उसके गले की माला टूट गई थी
धागा दर धागा
मोती दर मोती
मगर उसकी तेज़ नजर
उसके उंगली की मज़बूत पकड़
एक धागा टेढ़ा न हुआ
एक मोती नीचे न गिरा
वह अपने गरीब साड़ी
और गरीबी की ज़िंदगी से
उलझती चली जा रही थी।
इसी उलझन में एक और उलझन
टूटे मंगलसूत्र को फिर से जोड़ना
चेहरे पर वही सदियों की शांति
मन में द्वंद्व, हलचल, आह सब था।
उसके संघर्ष पर मुझे खुशी थी
उस धागे के महत्व पर गर्व था।
सबसे ज्यादा उस धूल धूसरित
काया पर गर्व था, हर्ष था।



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