ग़ज़ल

 अब जबानबंदी का हुकुम है

साहब ज़रा इशारे में बात करो

दिन की थकान है समझो ज़रा

रात की बात है अभी रात करो

एक बात पर यकीन न आए 

तो हैरत एक नहीं सात करो

जहां दिमाग़ काम न आए अगर

तुम खूब बात ए जज़्बात करो

उड़ते भागते परिंदे से कहा 'सहर्ष'

शहर हमारे भी आराम-ए-रात करो


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