स्टेशन की घास
बड़े शान से बना था प्लेटफॉर्म
और फिर आते जाते
लोगों में से किसी ने
चुपके से
ग़लती से
अनजाने में
या जान बुझकर।
उसके सीमेंट को तोड़ दिया
फिर आते जाते लोगों ने
कुछ और ही योगदान दिया
फिर कण कण वह सीमेंट झड़ने लगा।
मौका था
दस्तूर भी
वहां से चुपके से एक घास
ऊपर उठ आया
उसने अपनी गर्दन
ऊपर नीचे
फिर बायीं दायीं तरफ लहराया
और फिर ऊपर उठता चला गया
यदा कदा
किसी के बोतल से गिरा पानी
या फिर
किसी ने
पान की पिलखी फेकी
या किसी ने स्टाइल में कुल्ला।
और फिर उसके ज़िंदगी को
हवा मिल गया।
हरे रंग में रंगा
वह भी दूर ज़मीन पर गड़े
घास सा इठलाने लगा।
ख़ुशी फिर देर तक
न टिकी।
आते जाते लोग
जाने अनजाने में
उसे कुचलते गए
वह चीखता रहा,
अपने वजूद के लिए
अपने आस के लिए
अपने भविष्य के लिए।
और फिर धीरे धीरे
वह पीला पड़ने लगा
और एक दिन उजला हो गया
हरापन उसे छोड़ गया।
और एक दिन फिर
बारीश की बूंदें उस पर गिरी
फिर वही आस
फिर वही भविष्य
उसके ख्वाब में आने लगे।



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