अक्सर खामोशी में -ग़ज़ल
अक्सर ख़ामोशी में जब मैं चुप रहता हूँ।
यक़ीन मानो सच कहता हूँ।
ये बात ग़ैर कि थोड़ा अलग,
मगर अपने बहुत पास रहता हूँ।
ढलती शाम और चढ़ती रात का आलम,
तन्हा बहुत मैं, सुनसान रहता हूँ।
अब आओ के होश आ जाए मुझे,
स्याह रात में बहुत मदहोश रहता हूँ।
तेरे साये सी लगती है, तेरी तस्वीर मुझे
यूँ ही अक्सर तेरे पास रहता हूँ।
यक़ीन मानो सच कहता हूँ।
ये बात ग़ैर कि थोड़ा अलग,
मगर अपने बहुत पास रहता हूँ।
ढलती शाम और चढ़ती रात का आलम,
तन्हा बहुत मैं, सुनसान रहता हूँ।
अब आओ के होश आ जाए मुझे,
स्याह रात में बहुत मदहोश रहता हूँ।
तेरे साये सी लगती है, तेरी तस्वीर मुझे
यूँ ही अक्सर तेरे पास रहता हूँ।


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