मैं रिक्शावाला..... एक आदमी की आवाज़ (कविता)



हाँ साहब मैं वही रिक्शावाला हूँ
जिसे आप नीच नज़र से देखते हैं अपनी गाड़ी से
हर बार मेरी कोशिश, कोशिश रह जाती है
और आप ईंधन के दम पर आगे निकल जाते हैं
मेरा खून जलता है
आपका पैसा।

हर सवारी अक्सर मुझसे
मोलभाव करता है मुझे बातों में तौलता है,
पैसा देकर चुपचाप, आप बड़े मॉल से निकलते हैं
सड़क पर फिर वही दस रुपये के लिए झगड़ते हैं।

शापित हूँ या बेबस, नहीं जानता
पर अपना पेट काट कर
अपने आश्रितों को पालता हूँ
महीने में कभी छह महीने में घर चला जाता हूँ।

आखिर मेरी भी दुनिया है
जहां से मेरा वास्ता है
आपकी चमकती होगी साहब
अपनी अंधेरी लाचार ही सही, मगर प्यारी है।


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