बस से हैदराबाद
बस तो था तय
मगर मुझे घर से निकलने में वक़्त था
या यूँ कहें जिम्मेदारियां थी
भाई मनीष बाइक से
मैं बाईक के पीछे पहुंचा निज़ामसागर
लिया पानी और एक पेस्ट
दौड़ा बस स्टैंड घुसा भी जल्दी
बस चल पड़ी
मैं कहीं रुका रहा खड़े खड़े
बेटा रो रहा था आते वक़्त
जाना भी था मुझे आंध्रा कुर्नूल
फिर क्या करता ड्यूटी या जिम्मेदारी?
खैर चुना ज़िम्मेदारी!
खाना कुछ न खाया था
1 बजे थे और फिर 3 भी
भूख अपने चरम पर
मैं बेबस बस में
मिला एक बच्चा उसी से बातें
और वक़्त बिताया
उसने पूछा मेरी पहचान
उसे जुनियर लेक्चरर बताया
बस में खड़ा कभी इस सीट के सहारे कभी
उस सीट के सहारे और पहुँच गया
हैदराबाद के सीमा पर
अब जाकर बैठा सीट पर
बीच में बात किया जान से और विकास से भी
भूख कम न हुआ
शरीर से ताक़त ओस के बूंद सा गायब होने लगा
समय कब तक ठहरता एक सा
जल्दी ही साढ़े छः पर फ्रायड राइस खाया
दम में दम आया
और काचीगुड़ा की तरफ़ फ़िर चला बस में
ट्रेन के लिए।



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